सच का दीप जलाता हूँ

नीम-निबौली पर मैं मीठी परतें नहीं चढाता हूँ।
हाथ झुलसते जाते हैं लेकिन सच का दीप जलाता हूँ।।

उम्मीदों के आसमान पर शंकाओं का घना अंधेरा।
दुर्गा जहाँ शिकार हो गई कैसे होगा वहाँ सवेरा।
कर्तव्यों की बलिबेदी पर नरेन्द्र सिंह शहीद हो गए।
सोच खेमका की सच्ची तो उनको तबादलों ने घेरा।
किरण उजाले की उठते हीं यहाँ दबा दी जाती है।
एक खड़ा हो अभिमन्यु तो कोटि जयद्रथ पाता हूँ।।

सीमा पर घुसपैठ हो रही शीश सैनिकों के कट जाते।
बेटी घर से बाहर हों तो उन्हें भेडि़ए नोंचते खाते।
मासूमों के खाने में भी जहर मिलाया जाता है।
आतंकी और दंगाई तो जब चाहें कोहराम मचाते।
कोई नहीं रोकता है इन बहिशी और दरिंदों को।
कहाँ छुपे हो आकाओ मैं तुम्हें आवाज लगाता हूँ।।

अपने कल का पता नहीं है लोगों को बहकाते हैं।
कालव्याख्या करने वाले झूठे स्वांग रचाते हैं।
खरे नहीं चल पाते लेकिन खोटे सिक्के दौड़ रहे।
घड़ी बंद है जिनकी ऐसे बाबा समय बताते हैं।
संत कहे कोई इनको कोई अवतार बना देता।
रोज ठगे जाते फिरभी लाखों की भीड़ दिखाता हूँ।।

दीपक तले अंधेरा तो कुछ साथ हमेशा चलता है।
कुछ अच्छे इंसानों में दो-एक बुरा भी मिलता है।
उलट गए अनुपात आज सौ में कोई अच्छा एक मिले।
चाह उजाले की लेकर तब कड़ुवा-सत्य निकलता है।
ढहती हैं आशाएं लेकिन फिर से नींव जमाकर मैं।
मुट्ठी भर विश्वास हवाओं में भी रोज मिलाता हूँ।।