भौतिकवाद

सुरसा
भौतिकवाद आज की सुरसा,
बढ़ता जाए रोज बदन।

इंसानियत डकार गई और,
लोक-लाज का किया हनन।

परंपरा संस्कार सभ्यता,
का दिन रोज करे भक्षण।

राम नही ना बजरंगी अब,
बचना है तो करो जतन॥

12 comments:

Digamber Naswa said...

सच है खुद को खुद ही बचाना होगा आज ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-04-2016) को "जय बोल, कुण्डा खोल" (चर्चा अंक-2303) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

GathaEditor Onlinegatha said...

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Kavita Rawat said...

बहुत सटीक
बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता ..

Satish Saxena said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति , मंगलकामनाएं नव वर्ष की !

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

सटीक अभिव्यक्ति सच में भौतिकता के पीछे भागते भागते खुद को भी लोग भूलते जा रहे हैं
भ्रमर ५

Jyoti Dehliwal said...

बहुत सही। खुद को बचाना हो तो भौतिकवाद से भी खुद को बचाना होगा

Jyoti Dehliwal said...

बहुत सही। खुद को बचाना हो तो भौतिकवाद से भी खुद को बचाना होगा

Madhulika Patel said...

बहुत सटीक । बहुत बढ़िया ।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सार्थक पंक्तियाँ

Rajput said...

मौजूदा दौर को दर्शाती रचना। बहुत खूब

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-02-2019) को "प्रेम का सचमुच हुआ अभाव" (चर्चा अंक-3242) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'